शुक्रवार, 15 मार्च 2013

तुम को ढूंढा है


हर      सुबह     हर    शाम    तुम   को   ढूंढा है 
 हमने,  उम्र     तमाम      तुम   को     ढूंढा    है 



हर   शहर    की      ख़ाक      छान     मारी     है 
कभी छुप के ,कभी सरे आम   तुम   को  ढूंढा है 



हर फूल,हर कली ,को  बताया  है   हुलिया    तुम्हारा  
चेहरे का हर एक निशाँ ,करके ब्यान ,तुम को ढूंढा है

  

छुपे हो जरुर तुम  किसी  और लोक में, वरना   तो 
ज़मी सारी छानी ,फिर  आसमान पे, तुम को ढूंढा है 











8 टिप्‍पणियां:

  1. छुपे हो जरुर तुम किसी और लोक में, वरना तो
    ज़मी सारी छानी ,फिर आसमान पे, तुम को ढूंढा है

    कविता के जरिये हम उसे ही ढूढ़ते हैं ..
    उसे ईश्वर कहे ,या दोस्त .या हमारे ह्रदय का वह दूसरा हिस्सा
    जो हमारे बारे में सब कुछ जानकार भी हमें दिखाई नहीं देता
    प्रेम के भाव हमारे मन आकाश में बसंत ऋतू के श्वेत बादलों की
    तरह उभर आते है ..अनेकोँ रूप धरते हैं ..

    मीरा सी व्याकुलता को आपने शब्दों के माध्यम से
    बहुत सुन्दर तरीके से अभ्व्यक्त किया है ..
    किशोर

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  2. वाह अवन्ती जी वाह बहुत सुन्दर प्रस्तुति बधाई

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  3. हर फूल,हर कली ,को बताया है हुलिया तुम्हारा
    चेहरे का हर एक निशाँ ,करके ब्यान ,तुम को ढूंढा है ..

    बहुत खूब ... तलाश जरूर पूरी होती है ... शिद्दत से ढूंढा है आपने ...
    लाजवाब शेर ...

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  4. behatareen prastuti,mil jayag kahi n kahi gar koshishe jari rhae,na- ummidi ki diya dil me jalne n dijiye......

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  5. बहुत सुंदर,खोज एक प्रेम-पथिक की

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